बंड भूमियाल और मां नंदा का मिलन देख छलछलाई भक्तों की आंखें

गोपेश्वर (चमोली)। कैलाश की ओर बढ़ रही मां नंदा की बड़ी जात के छठे दिन भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बंड की नंदा डोली जब अपनी थाती बंड भूमियाल के धाम किरूली पहुंची तो भूमियाल और मां नंदा के मिलन का दृश्य देख श्रद्धालुओं की आंखें छलछला उठीं। नंदा के जयकारों और जागरों के बीच बंड भूमियाल का थान भक्ति और लोक आस्था से सराबोर हो गया। देर रात तक चांचणी और झुमेलो की स्वर लहरियों से पूरा क्षेत्र नंदामय रहा।

बड़ी जात की तीनों डोलियां अपने-अपने पड़ावों की ओर बढ़ रही हैं। बंड की नंदा कम्यार गांव के राजकोटी मंदिर से पोधार और मल्ला किरूली होते हुए बंड भूमियाल मंदिर पहुंची, वहीं राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डूंगरी से कैरा मैना होते हुए सूना गांव पहुंची। कुरुड़ दशोली की नंदा मटई ग्वाड़ से पगना गांव पहुंची। जगह-जगह ग्रामीणों ने डोलियों का पुष्पवर्षा के साथ स्वागत किया और अपनी ध्याणी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

भूमियाल की थाती में उमड़ा आस्था का सैलाब

किरूली में बंड नंदा की डोली के पहुंचते ही सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़े। बंड क्षेत्र के साथ दूर-दराज से पहुंचे लोगों ने मां नंदा और बंड भूमियाल के मिलन के साक्षी बने। जयकारों और जागरों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। चांचणी और झुमेलो की थाप पर श्रद्धालु देर रात तक झूमते रहे। ग्रामीणों ने मां नंदा को अपनी ध्याणी के रूप में खाजा, चूड़ा, बिंदी, चूड़ी, ककड़ी और मुंगरी समेत विभिन्न सामग्री अर्पित कर स्वागत किया। गांवों में नंदा के आगमन को लेकर उत्सव का माहौल बना हुआ है।

 

रास्ता नहीं मिला तो भूमियाल ने काटा था मार्ग

लोक मान्यता के अनुसार मां नंदा की कैलाश यात्रा में भूमियाल देवताओं की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। चरबंग के भूमियाल और बंड भूमियाल को नंदा की यात्रा का संरक्षक माना जाता है। मान्यता है कि वाण से आगे वेदनी कुंड और होमकुंड तक लाटू और ध्योसिंह देवता नंदा के भाई, संरक्षक और मार्गदर्शक के रूप में साथ रहते हैं।

मान्यता है कि रूपकुंड से आगे ज्यूरागोली नामक स्थान पर जब नंदा की यात्रा के लिए आगे का रास्ता नहीं मिलता और अन्य देवी-देवता भी आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाते हैं, तब बंड भूमियाल अपने अस्त्र कटार से रास्ता बनाते हैं। इसके बाद ही मां नंदा ताला उलारी, शिला समुद्र और होमकुंड की ओर आगे बढ़ती हैं।

लोक विश्वास यह भी है कि ज्यूरागोली में सभी देवी-देवताओं को कर के रूप में कुछ न कुछ अर्पित करना पड़ता था, लेकिन बंड भूमियाल को कर नहीं देना पड़ता था। यही वजह है कि नंदा की कैलाश यात्रा में बंड भूमियाल के मिलन को बेहद महत्वपूर्ण और भावनात्मक पड़ाव माना जाता है।

 

अगले पड़ावों को रवाना हुईं छंतोलियां

फरस्वाण फाट क्षेत्र की दर्जनों छंतोलियां भी बड़ी जात में शामिल होने के लिए अपने अगले पड़ावों की ओर रवाना हो गईं। निजमूला घाटी की दर्जनों छंतोलियां भी बड़ी जात में शामिल होने के लिए कैलाश की ओर प्रस्थान करेंगी। नंदा की डोलियों और छंतोलियों के साथ पहाड़ की लोक आस्था, परंपरा और भावनाओं का यह कारवां लगातार आगे बढ़ रहा है।

Portaladmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय में गूंजा “कॉलेज के टशनबाज” का जोश; फन, मस्ती और हुनरबाजी से सजी शाम में छात्र-छात्राओं ने जमकर लिया आनंद

Thu Sep 10 , 2026
गायन, गिटार, मिमिकरी और शानदार प्रस्तुतियों से युवाओं ने दिखाया अपना हुनर देहरादून। श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय में गुरुवार को युवाओं के उत्साह, उमंग, रचनात्मकता और प्रतिभा से भरपूर ‘कॉलेज के टशनबाज’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। 93.5 रेड एफएम के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम ने विश्वविद्यालय […]

You May Like

Breaking News

Share
error: